तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा सैन्य टकराव अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. पहले तेल के कुओं और सैन्य ठिकानों पर हमले होते थे, लेकिन अब दोनों पक्ष एक-दूसरे को घुटनों पर लाने के लिए पानी के बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं. डिसेलिनेशन प्लांट (समुद्री पानी को पीने लायक बनाने वाले संयंत्र) अब युद्ध के नए मैदान बन गए हैं.
जून में इस्लामाबाद समझौता टूटने के बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में फिर से तनाव चरम पर है. ईरान ने कुवैत के मुख्य बिजली उत्पादन और डिसेलिनेशन प्लांट पर ड्रोन-मिसाइल हमला किया, जिससे बिजली इकाइयां ठप हो गईं और आग लग गई. कुवैत सरकार को आपातकालीन योजनाएं लागू करनी पड़ीं और नागरिकों से पानी-बिजली बचाने की अपील करनी पड़ी. कुवैत अपनी 90% पानी की जरूरत समुद्री पानी को साफ करके पूरी करता है. ऐसे प्लांट समुद्र तट पर होने के कारण ईरानी मिसाइलों की जद में आसानी से आ जाते हैं.
अमेरिका का पलटवार भी तेज रहा. अमेरिकी सेना ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी होर्मोजगान प्रांत के बुंजी गांव में एक प्रमुख डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया. हमले में फिल्ट्रेशन उपकरण और पंपिंग सिस्टम पूरी तरह तबाह हो गए. इससे 20 से ज्यादा गांवों के करीब 10,000 लोग भीषण गर्मी में बिना पीने के पानी के रह गए. फारस की खाड़ी के देशों में प्राकृतिक मीठे पानी की भारी कमी है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यहां प्रति व्यक्ति सालाना 100 क्यूबिक मीटर से भी कम ताजा पानी उपलब्ध है. तेज शहरीकरण और आबादी बढ़ने के कारण ये देश पूरी तरह डिसेलिनेशन प्लांटों पर निर्भर हैं. पानी और बिजली के प्लांट एक-दूसरे से जुड़े 'कोजनरेशन सिस्टम' में काम करते हैं. एक प्लांट पर हमला होने से बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है, जिसका सीधा असर अस्पतालों, घरों और उद्योगों पर पड़ता है.
युद्ध अगर लंबा चला तो बहरीन, कतर जैसे देशों में पानी की सख्त पाबंदियां लगनी पड़ सकती हैं. 45°C से ज्यादा गर्मी में पानी का संकट बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य आपातकाल पैदा कर सकता है. ईरान-अमेरिका संघर्ष अब सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा है. पानी को निशाना बनाकर दोनों देश आम नागरिकों की जिंदगी को सीधे प्रभावित कर रहे हैं, जो इस टकराव को और भी खतरनाक बना रहा है.