पटना: क्या बिहार अपने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लगाई गई शराबबंदी पर फिर से विचार करेगा? भाजपा के सम्राट चौधरी के बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही बिहार में शराब की बिक्री को फिर से शुरू करने की अटकलें तेज हो गई हैं. सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ही सोशल मीडिया पर शराबबंदी हटाने की मांग जोर पकड़ रही थी. इस खबर में सिर्फ बढ़ती चर्चाओं और मांगों का जिक्र है, अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने खुलकर इस कदम का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि शराब फिर से उपलब्ध होनी चाहिए. अनंत ने यह भी कहा कि वे नए मुख्यमंत्री से इस मुद्दे पर बात करेंगे. सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनने से पहले शराबबंदी के कारण सरकार की आय पर पड़ने वाले नुकसान को स्वीकार किया था. कई लोग इसे शराबबंदी की समीक्षा का संकेत मान रहे हैं.
हालांकि इससे पहले सम्राट ने नीतीश का समर्थन करते हुए शराबबंदी को उनके सबसे निर्णायक कदमों में से एक बताया था. बिहार उन नए राज्यों में शामिल है जिन्होंने खुद को ड्राई स्टेट घोषित किया. वर्ष 2016 में नीतीश कुमार ने पूर्ण शराबबंदी लगा दी थी. इसका मुख्य लक्ष्य महिलाएं थीं, जो घरेलू हिंसा और पुरुषों द्वारा शराब पर घर का पैसा खर्च करने की शिकायत करती थीं.
शराबबंदी से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी JD(U) को महिलाओं का बड़ा समर्थन मिला, लेकिन राज्य में अवैध शराब की बिक्री बढ़ गई और सैकड़ों लोग नकली शराब पीने से जान गंवा चुके हैं. राज्य सरकार का खजाना तो नुकसान में रहा, लेकिन तस्करों की मोटी कमाई हो रही थी. Business Today TV के एसोसिएट एडिटर चेतन भूतानी ने X पर पोस्ट किया कि वे मानते हैं कि सम्राट चौधरी की पहली कैबिनेट बैठक में शराबबंदी हटाने पर चर्चा और फैसला हो सकता है.
नीतीश कुमार ने शराबबंदी क्यों लगाई?
बिहार में शराबबंदी हटाने की मांग नई नहीं है. 2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान जन सुराज के संस्थापक और पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा था कि उनकी पार्टी सत्ता में आते ही मिनटों में शराबबंदी हटा देगी. वहीं, RJD-कांग्रेस गठबंधन ने अपने घोषणा-पत्र में शराब नीति पर पुनर्विचार का वादा किया था.
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद यह मांग फिर से जोर पकड़ गई. कई आलोचकों का कहना है कि नीति को व्यवस्थित तरीके से लागू नहीं किया गया, जिससे शराब का काला बाजार बढ़ गया. 2025 में प्रशांत किशोर ने कहा था कि शराबबंदी के कारण बिहार को हर साल 20,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. बिहार में विश्व स्तरीय शिक्षा व्यवस्था के लिए अगले 10 वर्षों में 5 लाख करोड़ रुपे की जरूरत है. शराबबंदी हटने पर यह पैसा सिर्फ नई शिक्षा व्यवस्था बनाने पर खर्च किया जाएगा.
2016 में नीतीश कुमार ने देशी शराब के साथ-साथ भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था. महिलाओं और बच्चों का जबरदस्त समर्थन देखते हुए उन्होंने यह फैसला लिया. नीतीश कुमार ने कहा था कि राज्य में देशी शराब पर प्रतिबंध लगाए जाने के कुछ दिनों के अंदर लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों के जबरदस्त समर्थन को देखते हुए हमने पूर्ण शराबबंदी का फैसला किया.
सम्राट चौधरी का अलग-अलग बयान
नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शराबबंदी पर कई बार अलग-अलग बयान दिए हैं. कभी उन्होंने राजस्व नुकसान का हवाला देते हुए बैन हटाने का संकेत दिया, तो कभी नीतीश कुमार की नीति का समर्थन किया. 2025 के चुनाव प्रचार के दौरान जब उनसे पूछा गया कि बिहार में शराबबंदी सख्ती से लागू नहीं हो रही है, तो उन्होंने कहा कि इस नीति से राज्य में शांति आई है.
उन्होंने इसे महात्मा गांधी के विजन से जोड़ा और कहा कि शराबबंदी नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला है. उन्होंने कहा कि चोरी कौन नहीं करता? जो चोरी करते हैं, उन्हें करने दो. इसका मतलब था कि उल्लंघन तो होते रहेंगे, लेकिन बड़े लक्ष्य को इससे नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.
सम्राट चौधरी ने माना कि इस नीति से राज्य को लगभग 25,000 करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान हुआ है, फिर भी उन्होंने कहा कि इसका सामाजिक प्रभाव नुकसान से कहीं ज्यादा है. उन्होंने दावा किया कि अब सड़कों पर खुलेआम शराब पीते लोग नहीं दिखते. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि घर के अंदर निजी तौर पर शराब पीने पर कोई सख्त पाबंदी नहीं है.
उन्होंने आगे कहा कि शराबबंदी से बिहार को हर साल 28,000-30,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है, जबकि राज्य की कुल आय 70,000 करोड़ रुपए भी नहीं है. सम्राट ने पहले कहा था कि इन सब समस्याओं के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2016 में शराबबंदी का ऐतिहासिक फैसला लिया. बैन के बाद भी राज्य अच्छी तरह चल रहा है. अगर नीतीश कुमार के जीवन में एक ऐतिहासिक फैसला है, तो वह शराबबंदी है. फरवरी 2026 में एनडीए के सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) ने बिहार सरकार से 10 साल पुरानी शराबबंदी नीति की समीक्षा करने की अपील की थी.
RLM के विधायक माधव आनंद ने विधानसभा में कहा था कि मुख्यमंत्री ने कई ऐतिहासिक फैसले लिए हैं और समय-समय पर उनमें समीक्षा भी की है. शराबबंदी भी ऐसा ही एक फैसला है. अब समय आ गया है कि हम इस कानून की समीक्षा करें कि यह काम कर रहा है या नहीं. उस समय सम्राट चौधरी ने कहा था कि शराब कानून वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं है.
अब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ बिहार में शराबबंदी की समीक्षा और संभवतः उसे हटाने की चर्चाएं तेज हो गई हैं. लेकिन अभी तक सत्तारूढ़ एनडीए और नए मुख्यमंत्री की ओर से बैन हटाने का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है.