SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग ने विपक्ष की दो पुरानी मांगें मानीं, मिलेगी रीडेबल पीडीएफ और नया मतदाता नामांकन

Amanat Ansari 16 Oct 2026 01:42 PM 2 Mins
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग ने विपक्ष की दो पुरानी मांगें मानीं, मिलेगी रीडेबल पीडीएफ और नया मतदाता नामांकन

नई दिल्ली: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देशभर में हो रहे भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव आयोग ने विपक्ष की लंबे समय से चली आ रही दो प्रमुख मांगें मान ली हैं. आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नए मतदाताओं (खासकर 18 साल पूरे करने वाले युवाओं) को जोड़ने के लिए स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) की घोषणा की है. साथ ही पहली बार राजनीतिक दलों को मतदाता सूची की रीडेबल (मशीन-रीडेबल) सॉफ्ट कॉपी पीडीएफ देने का वादा किया है.

ये दोनों फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR प्रक्रिया के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) तथा विपक्षी दलों के बढ़ते प्रदर्शनों के बीच आए हैं. SIR में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम कटने के आरोप लग रहे हैं, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ है. SIR एक विस्तृत प्रक्रिया है, जिसमें नागरिकता साबित करने या पुरानी सूची से मैपिंग के दस्तावेज मांगे जाते हैं. जबकि SSR नियमित वार्षिक प्रक्रिया है, जिसमें नई योग्य आयु वाले मतदाताओं को जोड़ा जाता है और सूची अपडेट की जाती है.

SIR के कारण SSR रोक दिया गया था, जिससे Gen-Z मतदाता 2024-25 के बाद नामांकन नहीं कर पा रहे थे. अब आयोग ने उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत 17 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में SSR शुरू करने की घोषणा की है. इससे नए मतदाताओं को नामांकन का मौका मिलेगा, लेकिन SIR में पहले से कटे 13 करोड़ नाम अपने आप वापस नहीं जुड़ेंगे.

कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम ने ट्वीट कर कहा, “प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार को अक्ल आई है. करोड़ों नाम अवैध रूप से हटाने के बाद अब छूटे मतदाताओं को जोड़ने का नया अभ्यास! ज्ञानेश कुमार पर दोहरे खर्च का सरचार्ज लगना चाहिए.”

दूसरा बड़ा कदम है, सभी राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची की मशीन-रीडेबल पीडीएफ सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध कराना. इसके अलावा जोड़-घटाव और संशोधनों की सूची भी दी जाएगी, ताकि दल आसानी से बदलाव ट्रैक कर सकें. अब तक आयोग केवल इमेज-ओनली या स्कैन किए गए पीडीएफ देता था, जिनमें सर्च या कॉपी नहीं हो सकती थी. कांग्रेस ने 2018 में ही यह मांग उठाई थी. कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन आयोग ने प्राइवेसी और डेटा माइनिंग का हवाला देते हुए विरोध किया.

कोर्ट ने भी आयोग के पक्ष में फैसला दिया. 2025 में राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ अभियान के दौरान फिर यह मांग दोहराई और आरोप लगाया कि जानबूझकर इमेज पीडीएफ दी जाती है ताकि डुप्लीकेट और फर्जी वोटर्स पकड़ना मुश्किल हो. अब दबाव के बीच आयोग ने अपना रुख बदल लिया है.

एनसीपी (एसपी) विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा, “बड़ा नाटक करने के बाद आखिरकार चुनाव आयोग ने रीडेबल फॉर्मेट में सॉफ्ट कॉपी देने की बात मान ली. 2018 में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, तब आयोग ने विरोध किया था. आखिर छिपाना क्या चाहता था?” विपक्ष इन फैसलों को दबाव का नतीजा बता रहा है. सवाल यह है कि क्या ये कदम मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों को शांत कर पाएंगे या विवाद और गहराएगा.

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