फतेहपुर विवाद: अविमुक्तेश्वरानंद ने मंदिर के गर्भगृह में जाने से किया इनकार, उठे कई सवाल

Global Bharat 29 May 2026 03:09: PM 2 Mins
फतेहपुर विवाद: अविमुक्तेश्वरानंद ने मंदिर के गर्भगृह में जाने से किया इनकार, उठे कई सवाल

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने धार्मिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य कहे जाने वाले अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती फतेहपुर में लोगों को संबोधित करने पहुंचे थे, लेकिन वहीं मौजूद प्रसिद्ध तांबेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में जाने से उन्होंने इनकार कर दिया। उनके इस फैसले और उसके पीछे दिए गए तर्क ने कई लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाई है।

कई लोगों का कहना है कि शायद यह पहली बार है जब किसी संत ने सार्वजनिक रूप से किसी मंदिर के गर्भगृह में जाने से मना किया हो। क्योंकि मंदिर और मठों को ही शंकराचार्यों का घर माना जाता है और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर होती है। ऐसे में उनके इस फैसले पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि गर्भगृह में संतोषी माता की प्रतिमा स्थापित होने के कारण उन्होंने वहां प्रवेश नहीं किया। इसके बाद फतेहपुर में विरोध शुरू हो गया। हालांकि उनकी यात्रा आगे बढ़ गई, लेकिन लोग अब भी पूछ रहे हैं कि क्या खुद को शास्त्रों का ज्ञाता कहने वाले संत से कोई बड़ी भूल हो गई है।

तांबेश्वर महादेव मंदिर की अपनी अलग मान्यता भी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक अंग्रेजों के दौर में मंदिर का मुख्य द्वार जेल की ओर पड़ता था। कहा जाता है कि जब कैदियों को वहां से ले जाया जाता था तो वे भगवान से प्रार्थना करते थे और कई लोगों को जल्द रिहाई मिल जाती थी। इसी वजह से अंग्रेजों ने मंदिर के गेट की दिशा बदलवा दी थी।

इस पूरे विवाद के बीच अविमुक्तेश्वरानंद का एक बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा कि संतोषी माता और साईं बाबा “फिल्मी देवता” हैं और उनका कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है। उनके इस बयान पर भी सोशल मीडिया और धार्मिक समूहों में बहस छिड़ गई है।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि किसी की आस्था को इस तरह ठेस पहुंचाना क्या उचित है। रामचरितमानस के उत्तरकांड का उदाहरण देते हुए कई लोग यह भी कह रहे हैं कि सनातन परंपरा में गुरु और भगवान दोनों का सम्मान सर्वोपरि माना गया है।

विवाद के बीच कुछ लोग अविमुक्तेश्वरानंद पर राजनीति से प्रभावित होने के आरोप भी लगा रहे हैं। इससे पहले भी उन पर अलग-अलग मुद्दों पर राजनीतिक बयान देने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि उनके समर्थक इसे शास्त्रों और परंपराओं की रक्षा का प्रयास बता रहे हैं।

अब यह बहस तेज हो गई है कि उनका यह कदम सनातन परंपरा की रक्षा है या फिर आस्था के खिलाफ दिया गया एक विवादित संदेश। इस पूरे मामले पर लोगों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं।

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