लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जगद्गुरु रामभद्राचार्य की मुलाकात की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा उस क्षण की हो रही है जब जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने मंच पर मुख्यमंत्री को अपने पास बुलाया, माइक बंद कराया और उनके कान में कुछ कहा। इसके बाद उन्होंने एक पर्ची भी मुख्यमंत्री को देने की कोशिश की।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले जगद्गुरु रामभद्राचार्य का आशीर्वाद लिया। इसके बाद दोनों के बीच कुछ देर बातचीत हुई। वायरल वीडियो में दिखाई देता है कि रामभद्राचार्य मुख्यमंत्री को अपने पास बुलाकर कुछ निजी बातें बताते हैं। बातचीत के दौरान मंच का माइक बंद कर दिया जाता है, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि दोनों के बीच क्या चर्चा हुई।

इस दौरान रामभद्राचार्य ने मुख्यमंत्री को एक पर्ची भी देने की कोशिश की। पहले योगी आदित्यनाथ ने उसे लेने में संकोच दिखाया, लेकिन बाद में उन्होंने वह पर्ची स्वीकार कर ली। इसके साथ ही मुख्यमंत्री को कुछ धार्मिक पुस्तकें भी भेंट की गईं।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब रामभद्राचार्य लगातार सार्वजनिक मंचों से हिंदुत्व, गौसंरक्षण और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि यदि हिंदुत्व समर्थक ताकतों को व्यापक जनसमर्थन मिलता है तो गोवध पर पूर्ण रोक जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि उत्तर प्रदेश में फिर से कमल खिलने का भरोसा उन्हें है।

रामभद्राचार्य इससे पहले भी कई अवसरों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यों की सराहना कर चुके हैं। चाहे कानून व्यवस्था का मुद्दा हो, धार्मिक आयोजन हों या सनातन पर होने वाली बहस, उन्होंने कई बार खुलकर मुख्यमंत्री का समर्थन किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में संत समाज का प्रभाव लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में रामभद्राचार्य और अन्य प्रमुख संतों का समर्थन आगामी चुनावी माहौल में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।

हालांकि मंच पर दी गई पर्ची में क्या लिखा था और कान में क्या कहा गया, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
इस घटना ने एक बार फिर यह दिखाया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक और सामाजिक प्रभाव रखने वाले संतों की भूमिका को लेकर चर्चाएं लगातार बनी हुई हैं।