...यह है बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की तस्वीर, जो बिना पगड़ी बांधे सीएम पद की शपथ लेते हैं, तो लोगों को इनका पुराना बयान याद आ जाता है, जब इन्होंने कहा था नीतीश कुमार को सीएम पद से हटाने पर ही पगड़ी खोलूंगा, हालांकि नीतीश जब आरजेडी छोड़कर एनडीए में आए थे, तभी सम्राट ने अयोध्या में स्नान कर पगड़ी उतार दी थी, लेकिन आज लगता है प्रण पूरी तरह से पूरा हुआ है...क्योंकि बीजेपी लंबे वक्त से बिहार में अपना सीएम बनाना चाहती थी...पर यहां पेंच ये फंसा हुआ कि तेजस्वी यादव इन्हें सेलेक्टेड सीएम बता रहे हैं, क्योंकि सम्राट चौधरी पहले आरजेडी में हुआ करते थे, और नित्यानंद राय ने इन्हें बीजेपी ज्वाइन करवाया था. मुंगेर के रहने वाले सम्राट चौधरी के बारे में कहा जाता है इन्होंने शुरुआती पढ़ाई मदरसे से पूरी की थी, क्योंकि वहां सरकारी स्कूल बहुत दूर था. ये बीजेपी की हार्ड हिंदुत्व वाली लाइन पर नहीं बल्कि लालू यादव के सियासी समीकरण पर चलने वाले नेता थे, आज भी सम्राट चौधरी के पिता शकुनि चौधरी मोदी के धुर विरोधी माने जाते हैं, जिनका एक बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है...
फिर सवाल ये उठ रहा है कि सम्राट चौधरी ने इन सारी बातों के होते हुए बाजी कैसे मार ली, क्योंकि बिहार बीजेपी के पास चेहरों की कमी तो है नहीं...वहां उन नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने पार्टी को दशकों तक अपने पसीने से सींचा है... आपको याद होगा एक समय था जब नित्यानंद राय को बिहार भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था और वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे.
लेकिन तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि जिस सम्राट को पार्टी में लाया गया है, वे इतनी तेजी से बढ़ेंगे कि खुद नित्यानंद राय और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लिए ही बड़ी चुनौती बन जाएंगे. राजीव प्रताप रूडी का प्रशासनिक अनुभव, मंगल पांडेय की सांगठनिक पकड़, प्रेम कुमार की वरिष्ठता और विजय सिन्हा का विधानसभा का अनुभव, ये सब सम्राट चौधरी के उदय के सामने फीके पड़ते नजर आए. यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री रेणु देवी इस रेस में पीछे छूट गईं. तो सवाल उठता है बीजेपी ने सम्राट चौधरी में क्या देखा, जो नित्यानंद राय, मंगल पांडेय, विजय सिन्हा, राजीव प्रताप रूडी, प्रेम कुमार और रेणु देवी जैसे नेताओं में नहीं दिखा.
जानकार कहते हैं कि सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक कौशल और पार्टी के ‘कास्ट कार्ड’ के सटीक समीकरण से न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं को मात दे दिया. उनके आक्रमक अंदाज के आगे सब फीके पड़ गए, इन्होंने हाईकमान के हर आदेश को फॉलो किया.
जब नीतीश ने गठबंधन तोड़ा तो सम्राट ने उन्हें भी खूब कोसा, और जब नीतीश वापस आए तो आरजेडी पर सम्राट खूब हमलावर रहे...यही वजह रही कि जब इनके नाम का ऐलान हुआ तो नीतीश कुमार ने खुद इन्हें ताली बजाकर कुर्सी सौंपी, क्योंकि नीतीश ने जिस लव-कुश समीकरण यानि कुर्मी-कोईरी जाति के सहारे बिहार में राज किया, उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सम्राट के पास है, क्योंकि नीतीश कुर्मी जाति से थे, जबकि सम्राट कुशवाहा जाति से आते हैं. अगर नीतीश बेटे को कुर्सी सौंपते तो परिवारवाद का आरोप लगता, इसीलिए सम्राट के नाम पर संघ की पूरी तरह से सहमति न बनने के बावजूद भी बीजेपी ने सम्राट को चुना. और बिहार में ये चर्चा होने लगी कि सम्राट चौधरी बीजेपी के लिए क्या दूसरे हिमंता बिस्वा सरमा साबित होंगे, क्योंकि हिमंता भी कभी कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे,लेकिन कांग्रेस से नाराजगी के बाद वो बीजेपी में आए तो पार्टी ने उन्हें सीएम बनाकर बड़ा दांव खेल दिया था, और सम्राट के साथ भी अब यही हुआ है.