Prime Minister Balen Shah: नेपाल के नए और युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने भारत समेत सभी पड़ोसी मुल्कों में हलचल पैदा कर दी है. सदियों पुरानी कलंक की जो दीवार कोई प्रधानमंत्री हिला तक नहीं पाया, उसे गिराने की कोशिश में बालेन शाह लगे हैं, जिसने भारत में दलितों के बड़े नेताओं को ऊपर भी एक नैतिक दबाव पैदा कर दिया है, क्योंकि बालेन शाह सरकार ने सदियों तक अत्याचार झेलने वाले दलितों से माफी मांगने का फैसला लिया है.
अगले 15 दिनों में औपचारिक तौर पर माफीनामा जारी होगा, ताकि सामाजिक न्याय, शिक्षा-रोजगार में समान मौका मिले. 100-दिन की शासन-सुधार कार्ययोजना के तहत एक सुधार कार्यक्रम भी शुरू होगा, ताकि समावेशी पुनर्वास, ऐतिहासिक मेल-मिलाप हो सके. साल 2006 में नेपाल ने खुद को छुआछुत मुक्त राष्ट्र घोषित किया था, 2011 में भेदभाव अपराध भी बना, पर भेदभाव के मामले नहीं रुके.
आज भी वहां दलितों की हालत ठीक नहीं है, जबकि आबादी के लिहाज से उनकी हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी है. बड़े पदों पर आज भी वहां दलितों की संख्या बेहद कम है, कुछ ऐसा ही हाल बाकी पड़ोसी मुल्कों का भी है. पाकिस्तान में दलितों की संख्या करीब 8 लाख से ज्यादा है, जो आज भी हाथ से मैला ढोने, सीवर की सफाई और चमड़े का काम करते हैं, उनके साथ जातिगत और धार्मिक दोनों भेदभाव होता है.
बांग्लादेश में करीब 60 लाख दलित रहते हैं, जो आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े पायदान पर हैं. ये भी पाकिस्तान के दलितों की तरह उपेक्षित हैं. श्रीलंका में जाति व्यवस्था उतनी गंभीर नहीं दिखती, लेकिन वहां भी कुछ समुदायों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता. जबकि भारत में भी दलितों के साथ भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन यहां साल 1990 से ही SC/ST एक्ट लागू है, 1950 से ही छुआछुत अपराध बना हुआ है, बावजूद उसके नगीना से सांसद चंद्रशेखर ससंसद में ये मांग उठाते हैं कि भारत की संसद को भी नेपाल की सरकार की तरह सदियों से अत्याचार झेल रहे दलितों से माफी मांगनी चाहिए.
हालांकि नेपाल और भारत की स्थितियां अलग-अलग है, यहां कई दलित नेता राष्ट्रपति से लेकर उप प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे..रामनाथ कोविंद से लेकर जगजीवन राम तक इसके बड़े उदाहरण हैं, यूपी में मायावती पहली दलित महिला मुख्यमंत्री भी बन चुकी है, यहां का संविधान दुनियाभर को सीख देता है, औपचारिक माफी भले ही किसी सरकार ने नहीं मांगी, लेकिन नेपाल और भारत की हालत में काफी अंतर है ये बड़े-बड़े जानकार मानते हैं. तभी तो भारत की संसद में मनोज झा जैसे नेता ठाकुर का कुआं कविता सुनाते हैं और दलित नेता भी इसकी तारीफ करते हैं.
चूंकि बालेन शाह एक नई परंपरा की नींव रख रहे हैं, इसलिए उनकी इस नीति पर कई देशों में अलग-अलग मांग उठ रही है. ऐसे में चंद्रशेखर की मांग पर आप क्या कहेंगे, अपनी राय भी जरूर दें, क्योंकि सवाल राष्ट्र का है.