उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओम प्रकाश राजभर और समाजवादी पार्टी के बीच टकराव अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं दिख रहा है। यह लड़ाई धीरे-धीरे 2027 विधानसभा चुनाव की सोशल इंजीनियरिंग से जुड़ती जा रही है। राजभर लगातार अपने सोशल मीडिया पोस्ट और बयानों में समाजवादी पार्टी, अखिलेश यादव और यादव राजनीति पर हमला बोल रहे हैं। वहीं सपा भी इस टकराव को हल्के में नहीं ले रही है। सवाल यही है कि आखिर योगी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर यादव राजनीति के पीछे इतने आक्रामक तरीके से क्यों पड़े हैं?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए यूपी और बिहार की राजनीति के पुराने अध्यायों को देखना होगा। नब्बे के दशक में बिहार में लालू प्रसाद यादव की राजनीति सामाजिक न्याय के नारे के साथ आगे बढ़ी। लेकिन विरोधियों ने लगातार आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय की राजनीति धीरे-धीरे यादव केंद्रित राजनीति में बदल गई। यही आरोप यूपी में मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव की सरकारों पर भी लगता रहा। विपक्ष ने बार-बार कहा कि सत्ता, सिस्टम और प्रशासनिक हिस्से में यादव समाज को ज्यादा महत्व मिला। इसी आरोप को भाजपा और उसके सहयोगी दल आज भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।
पंचायती-समाचार :
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) June 18, 2026
टिकटार्थियों के बाद अधिकारी और ठेकेदार मिलके कर रहे ‘ढुंढाई पंचायत’
समाचार-विस्तार : कल तक तो ‘अफ़वाही’ मंत्री जी को केवल वो भावी प्रत्याशी ही ढूँढ रहे थे जिनसे इन्होंने टिकट के नाम पर एडवांस वसूल लिया था, लेकिन अब जो जान गये हैं कि ‘30 सीट’ की बात अफ़वाह है।… pic.twitter.com/gBewgyc2b5
ओम प्रकाश राजभर की राजनीति को इसी पृष्ठभूमि में देखना होगा। राजभर जब यादव राजनीति पर हमला करते हैं, तो उनका निशाना सिर्फ एक जाति नहीं होता, बल्कि समाजवादी पार्टी का वह कोर वोट बैंक होता है, जिसे सपा की सबसे मजबूत सामाजिक ताकत माना जाता है। सपा का MY समीकरण यानी मुस्लिम-यादव वोट बैंक लंबे समय तक उसकी राजनीति की रीढ़ रहा है। अखिलेश यादव ने अब इसे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की नई भाषा में बदलने की कोशिश की है। लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दल इसी PDA में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की कोशिश गैर-यादव पिछड़े वोटरों को अपने साथ बनाए रखने की है। 2014 के बाद भाजपा ने यूपी में गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित वोटरों को जोड़कर बड़ी चुनावी सफलता हासिल की थी। यही सामाजिक समीकरण भाजपा की ताकत बना। लेकिन PDA की राजनीति आने के बाद सपा ने फिर से पिछड़े वर्गों में विस्तार की कोशिश शुरू की है। ऐसे में ओम प्रकाश राजभर को भाजपा के लिए एक ऐसे चेहरे के रूप में देखा जा रहा है, जो पूर्वांचल में गैर-यादव OBC समाज के बीच सपा के प्रभाव को चुनौती दे सकते हैं।
राजभर के हमलों का दूसरा मकसद समाजवादी पार्टी को रक्षात्मक बनाना भी है। जब वह यादववाद, सिस्टम में पक्षपात या सपा सरकारों के पुराने आरोपों को उठाते हैं, तो सपा को बार-बार सफाई की मुद्रा में जाना पड़ता है। भाजपा के लिए यह रणनीति उपयोगी हो सकती है, क्योंकि इससे चुनावी बहस बेरोजगारी, महंगाई या स्थानीय मुद्दों से हटकर जातीय समीकरण और पुराने आरोपों पर टिक जाती है।
अखिलेश जी ने आज अपने PDA की नई व्याख्या की। उन्होंने कहा कि PDA में A का मतलब आदिवासी है।
— Om Prakash Rajbhar (@oprajbhar) June 25, 2026
A को अल्पसंख्यक और अगड़ा वो, पहले ही बता चुके हैं।
डर ये लग रहा है कि अखिलेश जी किसी दिन कोई सम्मेलन करते हुए यह न कह दें कि A का मतलब आंकवादी भी होता है!
वैसे भी उनकी सरकार अपने कार्यकाल…
सपा भी इसीलिए राजभर को हल्के में नहीं ले रही। अखिलेश यादव कई बार यह संकेत दे चुके हैं कि राजभर की नेगोशिएशन वाली राजनीति को कमजोर किया जाएगा। सपा की कोशिश पूर्वांचल में राजभर समाज के भीतर वैकल्पिक चेहरों को आगे लाने की है, ताकि ओम प्रकाश राजभर की राजनीतिक पकड़ सीमित की जा सके। शिवपाल यादव भी राजभर को लेकर तीखे बयान दे चुके हैं। यानी सपा समझ रही है कि राजभर सिर्फ बयान देने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि भाजपा की चुनावी रणनीति में एक उपयोगी मोहरा भी साबित हो सकते हैं।
पूर्वांचल की राजनीति में राजभर समाज कई सीटों पर असर रखता है। गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर और आसपास के इलाकों में छोटे-छोटे जातीय समीकरण चुनावी नतीजे बदल देते हैं। यही वजह है कि ओम प्रकाश राजभर की सीट, उनकी चुनावी तैयारी और उनके बयानों को सपा गंभीरता से देख रही है। अगर राजभर गैर-यादव पिछड़े वोटरों में यह धारणा मजबूत कर देते हैं कि सपा सिर्फ यादव केंद्रित पार्टी है, तो PDA की पूरी रणनीति पर असर पड़ सकता है।
हालांकि यह भी सच है कि ज्यादा आक्रामक जातीय बयानबाजी उल्टा असर भी कर सकती है। यूपी की जनता अब सिर्फ जाति नहीं, बल्कि स्थानीय विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार और सम्मान की राजनीति भी देखती है। इसलिए राजभर का दांव कितना सफल होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इसे सिर्फ यादव विरोध की भाषा में रखते हैं या गैर-यादव पिछड़ों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भाषा में बदल पाते हैं।
फिलहाल इतना साफ है कि यूपी की सियासत में राजभर बनाम सपा का टकराव 2027 से पहले बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। भाजपा चाहती है कि सपा का PDA समीकरण जमीन पर पूरी तरह मजबूत न हो पाए। सपा चाहती है कि राजभर की राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत कम हो। और ओम प्रकाश राजभर चाहते हैं कि पूर्वांचल में वह फिर से ऐसे नेता के रूप में खड़े दिखें, जिनके बिना पिछड़ों की राजनीति अधूरी है।
अब देखना यह होगा कि इस लड़ाई में फायदा किसे मिलता है—भाजपा को, सपा को या खुद ओम प्रकाश राजभर को।