हाथरस के अस्पताल में इंसानियत की मौत! 80 साल की मां का शव ले जाने लिए नहीं मिला स्ट्रेचर, गोद में ही उठाया शव

Rahul Jadaun 12 Jul 2026 06:34: PM 1 Mins
हाथरस के अस्पताल में इंसानियत की मौत! 80 साल की मां का शव ले जाने लिए नहीं मिला स्ट्रेचर, गोद में ही उठाया शव

हाथरस: उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले से सरकारी स्वास्थ्य महकमे को पूरी तरह शर्मसार कर देने वाली एक बेहद असंवेदनशील तस्वीर सामने आई है। यहाँ जिला अस्पताल के स्टाफ की घोर लापरवाही के कारण एक लाचार बेटा अपनी 80 वर्षीय मृत मां के शव को अपनी गोद में उठाकर एम्बुलेंस और शव वाहन के लिए भटकता रहा। हद तो तब हो गई जब अस्पताल परिसर में मौजूद किसी भी स्वास्थ्य कर्मी ने मृत वृद्धा के शव को रखने के लिए एक अदद स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं कराया। अंततः बेबस परिजन शव को एक ई-रिक्शा में लादकर अपने घर ले जाने को मजबूर हो गए।

सड़क हादसे में घायल हुए थे मां-बेटा

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह दर्दनाक मामला चंदपा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले आगरा-अलीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाईवे) का है। शनिवार की देर शाम करीब 8 बजे नंद नगरिया (कोतवाली सदर) के निवासी महेंद्र अपनी 80 साल की बुजुर्ग मां कनक प्यारी (पत्नी मोहन लाल) के साथ बाइक से दवा लेकर घर लौट रहे थे। इसी दौरान चंदपा के समीप एक अज्ञात अनियंत्रित वाहन ने उनकी मोटर साइकिल को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण दुर्घटना में मां और बेटे दोनों ही गंभीर रूप से जख्मी हो गए।

इलाज के दौरान तोड़ा दम, अस्पताल में संवेदनशीलता हुई दफन

हादसे के तुरंत बाद दोनों घायलों को उपचार के लिए आनन-फानन में जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ वे रातभर उपचाराधीन रहे। हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद रविवार की दोपहर इलाज के दौरान बुजुर्ग महिला कनक प्यारी ने दम तोड़ दिया। मां की मौत के बाद परिजनों ने शव का पोस्टमार्टम कराने से साफ मना कर दिया और कागजी औपचारिकताएं पूरी कीं।

इसके बाद अस्पताल प्रशासन का बेहद क्रूर चेहरा सामने आया। मृतका का बेटा महेंद्र अपनी मां के पार्थिव शरीर को हाथों में उठाए परिसर में खड़ा रहा, लेकिन सिस्टम पूरी तरह मौन रहा। किसी भी जिम्मेदार कर्मचारी का दिल नहीं पसीजा और शव को ले जाने के लिए स्ट्रेचर तक नहीं दिया गया। गंभीर चोटों से खुद जूझ रहा बेटा स्ट्रेचर के अभाव में मां की लाश को गोद में लेकर तड़पता रहा और बाद में ई-रिक्शा के जरिए शव को घर ले जाना पड़ा। पीड़ित महेंद्र ने बताया कि रात के अंधेरे में वे यह नहीं देख पाए कि किस अज्ञात वाहन ने उन्हें रौंदा था, लेकिन अस्पताल में जो बर्ताव हुआ उसने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया है।

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