नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने अयोध्या, काशी और मथुरा के धार्मिक स्थलों को लेकर बड़ा बयान दिया है. एक पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि उन्होंने 1991 में ही सुझाव दिया था कि इन तीनों स्थानों को पूजा स्थल अधिनियम 1991 से बाहर रखा जाए. ऐसा न होने के कारण आज देश में मंदिर-मस्जिद से जुड़े विवाद बढ़ रहे हैं.
उमा भारती ने बताया कि जब 1991 में पूजा स्थल अधिनियम संसद में लाया गया था, तब उन्होंने बीजेपी की ओर से बहस शुरू की थी. उन्होंने संसद में कहा था कि अयोध्या को इस कानून से बाहर रखा जाना चाहिए, क्योंकि वहां कोई हिंदू-मुस्लिम विवाद नहीं है. उन्होंने तर्क दिया कि बाबर कोई धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक आक्रमणकारी थे, जबकि भगवान राम इस देश की पहचान हैं. उमा भारती ने सुझाव दिया था कि अयोध्या के साथ-साथ काशी और मथुरा को भी इस कानून से अलग रखा जाए, ताकि हिंदू और मुस्लिम समुदाय आपसी सहमति से इन स्थानों पर मंदिर निर्माण का रास्ता निकाल सकें. इससे भविष्य में तनाव कम होगा और आने वाली पीढ़ियां शांति से रह सकेंगी.
उमा भारती ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर भी निशाना साधा. उन्होंने शाहबानो केस का जिक्र करते हुए कहा कि राजीव गांधी ने एक समुदाय को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था. उन्होंने कहा कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और काशी में विश्वनाथ मंदिर के ऐतिहासिक सबूत साफ हैं. इन स्थानों पर पहले मंदिर थे, यह बात स्पष्ट है. इसलिए इन मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे से हटाकर दोनों समुदायों के साधु-संतों और विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए.
उमा भारती ने मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे नेताओं की बेकार की बातों में न फंसें. उन्होंने कहा कि काशी, मथुरा और अयोध्या भगवान शिव, कृष्ण और राम के पवित्र स्थान हैं, जिन्हें मुस्लिम समुदाय भी सम्मान देता है. फिर भी, कुछ नेता इन मुद्दों को उलझा रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो भविष्य में और तनाव बढ़ सकता है, जैसा कि 6 दिसंबर (1992) को हुआ था.
उमा भारती ने जोर देकर कहा कि इन धार्मिक स्थलों के विवाद को सुलझाने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर समाधान खोजना होगा. उन्होंने 1991 में अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि अगर उस समय उनकी सलाह मान ली गई होती, तो आज देश में मंदिर-मस्जिद को लेकर इतने विवाद नहीं होते.